भोर की पहली किरण संग,
डाली पर बैठी चिड़िया गाए।
ओस-बूंद की मृदु मुस्कानों से,
अपना नन्हा मन भर लाए।
पंखों में जैसे धूप बसी हो,
आंखों में नीला आकाश।
हर तिनके में देखे सपने,
हर क्षण जी ले मधुमय उल्लास।
फुदक- फुदक कर डाल हिलाती,
मानों कहती-"डरना क्या?"
पवन बने जब मधुर सहेली,
गीतों की झरने लगती धार।
वन का हर पत्ता झूम उठे,
सुनकर उसका निम॔ल प्यार।
न धन चाहा, न ऊंचा सिंहासन,
न सोने-चांदी का संसार।
एक खुला गगन, हरियाली,
बस इतना ही उसका विस्तार।
चिड़िया सिखलाती है हमको-
सुख वस्तुओं का नाम नहीं।
जो मन को मुक्त उड़ान मिले,
उससे बढ़कर धाम नहीं।
आओ हम भी उससे सींखे,
आशा का हर दिन उत्सव हो।
डाली-डाली गूंजे जीवन,
हर धड़कन में नव वैभव हो।
-आलोक प्रकाश
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