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पाँव अपने ही ज़िद पर अड़े थे मगर

                
                                                         
                            पास उनके बहुत से घड़े थे मगर,
                                                                 
                            
वो घड़े सब ही उल्टे पड़े थे मगर।

प्यास अपनी बुझा ही न पाए कभी,
वो नदी के किनारे खड़े थे मगर।

राह आसान थी मंजिलें पास थीं
पाँव अपने ही ज़िद पर अड़े थे मगर।

उनका रुमाल गीला मिला जेब में,
महफ़िलों में वो हँसते बड़े थे मगर।

धूप में उम्र सारी गुज़रती रही,
साथ अपने ही साए खड़े थे मगर।

हाथ में इश्क़ वाली लकीरें न थी,
हम भी क़िस्मत से अपनी लड़े थे मगर।

सोच उनकी ‘सरल’ सबसे छोटी लगी,
आदमी वो बहुत ही बड़े थे मगर।
-सुरेश राय ‘सरल’
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45 मिनट पहले

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