आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गालियों वाली किताब

                
                                                         
                            “ गालियों वाली किताब”
                                                                 
                            

दो कचौड़ी, एक समोसा,
इन मर्दों का क्या भरोसा!
सुनकर तुम्हें क्यों लगी है आग,
अगर तुम्हारे चरित्र पर नहीं है दाग।
हम मानते हैं, नहीं होते सब एक जैसे,
ये तंज उन्हीं के लिए हैं, जो होते हैं ऐसे।
जब देता था कोई माँ-बहन की गालियाँ,
तब तो बजाते थे आप भी खूब तालियाँ।
पहले तो उन गालियों पर हँस रहे थे,
मेरी माँ-बहन नहीं हैं इनमें शामिल, यह सोच रहे थे।
अब दो-चार गालियाँ मर्दों के लिए क्या बनीं,
बात सब मर्दों की इज्जत पर आ बनी!
बुरी तो हमें भी बहुत लगती थीं,
जब हर गाली माँ-बहन से शुरू होती थी।
क्यों नहीं जागा तुम्हारे अंदर का मर्द तब,
रो रही थी किसी की माँ-बहन जब?
हर किसी का समय आता है, ये सोच लो,
बहुत रो चुकीं नारियाँ, अब थोड़ा तुम भी रो लो।
जब हर विभाग में बराबर की भागीदारी होने लगी है,
फिर गालियों वाली किताब में मर्दों का नाम क्यों नहीं है?
-पूजा शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर