भरी सभा में प्रश्न उठा था,
किसको मेरा दान मिला?
जिसने पहले स्वयं को हारा,
उसको कैसा मान मिला?
धर्म खड़ा था मौन सभा में,
किससे फिर सम्मान मिला?
जब तक नारी प्रश्न बनी है,
कैसे कह दें—जीता संसार?
युग बदले, दरबार बदल गए,
बदले कितने नाम यहाँ,
घर की देहरी, ऊँचे दफ़्तर,
फिर भी वही सवाल यहाँ।
किस अधिकार से रोकें उसको,
किसने यह अधिकार दिया?
जब तक नारी प्रश्न बनी है,
कैसे कह दें—जीता संसार?
जिसने सबके सपने सींचे,
उसका सपना कौन सुने?
जिसने घर को घर बनाया,
उसका अपना कौन चुने?
उसकी इच्छा पूछे बिन ही,
किसने उसका भाग्य लिखा?
जब तक नारी प्रश्न बनी है,
कैसे कह दें—जीता संसार?
कभी पिता की छाया कहकर,
कभी पति की पहचान बनी,
माँ के आँचल में सिमटी तो,
अपनी ही अनजान बनी।
रिश्ते सारे अपने फिर भी,
क्यों उसका अस्तित्व छिपा?
जब तक नारी प्रश्न बनी है,
कैसे कह दें—जीता संसार?
पढ़कर उसने शिखर छुए हैं,
अपना पथ निर्माण किया,
फिर भी उसके श्रम पर जग ने,
कितना कम सम्मान दिया।
एक समान परिश्रम करके,
क्यों मिलता है भिन्न पुरस्कार?
जब तक नारी प्रश्न बनी है,
कैसे कह दें—जीता संसार?
उसके वस्त्रों पर निर्णय हैं,
उसकी हँसी पर पहरे हैं,
उसकी स्पष्ट कही हुई ‘ना’ पर,
कितने कान अभी बहरे हैं।
दोष उसी के माथे मढ़कर,
कब तक बचेगा अत्याचार?
जब तक नारी प्रश्न बनी है,
कैसे कह दें—जीता संसार?
नहीं चाहिए दया किसी की,
नहीं किसी का उपकार,
जीवन के हर निर्णय पर हो,
उसका अपना अधिकार।
जहाँ न डर हो, न अपमान हो,
वहीं खिलेगा सच्चा प्यार।
जब तक नारी प्रश्न बनी है,
कैसे कह दें—जीता संसार?
आज द्रौपदी फिर पूछ रही,
क्या अब भी चुप रह जाओगे?
सम्मान अगर सबका हक़ है,
उसका हक़ कब अपनाओगे?
जब उत्तर कर्मों में उतरे,
तभी मिटेगा यह अँधियार।
जिस दिन नारी प्रश्न न होगी,
उस दिन सच में जीतेगा संसार।
— संतोष कुमार शर्मा
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