यह तन रज होय एक दिन, सिर धुनि रोवै लोग।
समुझत नाहीं नर हठी, संग न जाई भोग।।
जिद न कीजे भाग्य से, जो विधि में न होय।
बार-बार माँगने पर, मिलता नहीं सो कोय।।
दगा दिया वफ़ा कहकर, छीन गई पहचान।
तन तो मेरे संग रहा, ले गई मेरा प्राण।।
प्रीत किसी से कीजिए, माँगे तन-मन-शीश।
एक बार जो हृदय बसे, छूटे नहीं वो प्रीत।।
मौन रहकर भी मौन रहा नही जाता
ग़लत को ग़लत कहा भी नही जाता
-संवादों की भूलभुलैया, उलझे मन के तार।
जीते-जी मरते यहाँ, जीवन के किरदार।।
आज प्रीत का लग गया, चारों ओर बजार।
प्रीत समझे विरला कोई, गहन प्रेम व्यवहार।।
प्रीति अगर सच्ची रहे, लाख करे जग घात।
साँस छूट सकती मगर, प्रीत न छोड़े साथ।।
प्रीत ऐसी औषधि, हरती मन का भार।
प्रीत बने जब पीर तो, कहाँ मिले उपचार।।
दिल-दिमाग की उलझनें, सुलझे बिरला कोय।
उलझ-उलझ जीवन कटे, राह न सूझे कोय।
- अनामिका गुमनाम
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