दिल से कहाँ जा पाओगे
राह नई तुम चुन लोगे,
नए शहर में बस लोगे,
नई सुबह के संग शायद,
नई कहानी बुन लोगे।
सब कुछ नया बना लोगे,
याद कहाँ बदल पाओगे—
दूर बहुत हो जाओगे मगर,
दिल से कहाँ जा पाओगे॥
घर में सब कुछ वैसा होगा,
फिर भी कुछ तो बदला होगा,
वही शाम, वही खिड़की होगी,
एक कोना तन्हा होगा।
घर से दूर निकल जाओगे,
मन से कहाँ निकल पाओगे—
दूर बहुत हो जाओगे मगर,
दिल से कहाँ जा पाओगे॥
दिन दुनिया में कट जाएगा,
काम तुम्हें उलझाएगा,
शाम ढले कोई बीता लम्हा,
चुपके से लौट आएगा।
दिन को चाहे बहला लोगे,
रात कहाँ बहला पाओगे—
दूर बहुत हो जाओगे मगर,
दिल से कहाँ जा पाओगे॥
नाम मेरा मत दोहराना,
ज़िक्र मेरा मत कर पाना,
याद अगर चुपके से आए,
उसको भी तुम मत अपनाना।
होंठों को तो रोक भी लोगे,
मन को कैसे रोक पाओगे—
दूर बहुत हो जाओगे मगर,
दिल से कहाँ जा पाओगे॥
ख़त चाहो तो जला भी देना,
चित्र कहीं छुपा भी देना,
मेरी दी हर छोटी निशानी,
चाहो तो तुम हटा भी देना।
चीज़ें सारी हटा भी दोगे,
याद कहाँ मिटा पाओगे—
दूर बहुत हो जाओगे मगर,
दिल से कहाँ जा पाओगे॥
वक़्त नया रंग लाएगा,
दर्द भी इक दिन सो जाएगा,
जीवन फिर से चल निकलेगा,
मन भी हँसना सीख जाएगा।
दर्द भले ही कम कर लोगे,
प्यार कहाँ घटा पाओगे—
दूर बहुत हो जाओगे मगर,
दिल से कहाँ जा पाओगे॥
तुमसे कोई गिला नहीं है,
तुम पर मेरा हक़ नहीं है,
तुमको बाँध के पास रखूँ मैं—
प्यार अगर है, प्यार नहीं है।
पाँव तुम्हारे चल भी देंगे,
मन को कहाँ ले जाओगे—
दूर बहुत हो जाओगे मगर,
दिल से कहाँ जा पाओगे॥
कल शायद हम मिल न पाएँ,
एक-दूजे को बुला न पाएँ,
वक़्त हमारे नाम भुला दे,
मन के निशाँ मिटा न पाए।
मुझसे बिछड़ भी जाओगे तुम,
ख़ुद से कहाँ छुप पाओगे—
दूर बहुत हो जाओगे मगर,
दिल से कहाँ जा पाओगे॥
— संतोष कुमार शर्मा
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