गुरूर था हमें चाहत पे अपनी
न जाने कब इसे नजर लग गई
पता तो हमें तब चला
जब पानी सर से ऊपर हो गई।
नाज था हमें मोहब्बत पे अपनी
न जाने इए कब गैरों की हो गई
अपना है जिसको समझा था हमने
न जाने कब से वह दुसरे के हो गए।
भगवान की तरह पूजते थे जिनको
दुसरों की आदत लगी थी उनको
हमें तो मालूम कुछ भी न था
'धोखा' मिला है जाना यह अब तो।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X