झम-झम मेघ बरसते हैं सावन के,
छम-छम गिरती बूँदें पत्तों से छन के।
बिजली चमक रही है चम चम
कितने सपने जगते मन के।
उमड़ घुमड़कर आए बादल
मोर भी नाचे छम छम छम छम।
धरती की प्यास बुझाने को
नभ से पानी बरसे झम झम।
धरती का कण-कण
अब तो खिल-खिल गया है
सूखी नदियाँ, प्यासे उपवन को
जैसे जीवन मिल गया है।
रिमझिम-रिमझिम बूँदों का
संगीत है कितना सुहाना
बरसते बादलों को देख,
हर दिल गाये है तराना।
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