आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक स्त्री की अभिलाषा

                
                                                         
                            चरित्रवान तुम बडे, चरित्रहीन मैं हूं न
                                                                 
                            
आँखों में आगोश लिए तुम, मैं नादिया की धारा हूं न
प्रेम पत्र हम क्या लिखते , प्रेम समझ हम पाए न
शुरुआत करूँ मैं किससे हाँ , जीवन का अंत शुरू ही था
शाम दाम दण्ड भेदकर , तुमने हमको बेड़ी मे बंधा है
लाख करो तुम कोशिश निर्जन, पर कठोरता हममें ज्यादा है
पूछते हो इच्छायें मेरी, मृत्यु प्रथम ही ईच्छा है
सम्मान पाऊँ ये शौक है मेरा, दीपक सी जल जाऊँ मैं
कोई हमको कुछ भी बोले , निसंकोच ह्रदय के घाव खोले
मानसिक संतुलन फिर भी बचा है
कठोरता पूरे शरीर मे है , पत्थर सा ह्रदय रच है/
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर