चरित्रवान तुम बडे, चरित्रहीन मैं हूं न
आँखों में आगोश लिए तुम, मैं नादिया की धारा हूं न
प्रेम पत्र हम क्या लिखते , प्रेम समझ हम पाए न
शुरुआत करूँ मैं किससे हाँ , जीवन का अंत शुरू ही था
शाम दाम दण्ड भेदकर , तुमने हमको बेड़ी मे बंधा है
लाख करो तुम कोशिश निर्जन, पर कठोरता हममें ज्यादा है
पूछते हो इच्छायें मेरी, मृत्यु प्रथम ही ईच्छा है
सम्मान पाऊँ ये शौक है मेरा, दीपक सी जल जाऊँ मैं
कोई हमको कुछ भी बोले , निसंकोच ह्रदय के घाव खोले
मानसिक संतुलन फिर भी बचा है
कठोरता पूरे शरीर मे है , पत्थर सा ह्रदय रच है/
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