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तुम्हारी स्मृतियाँ

                
                                                         
                            हिम्मत बढ़ाती स्मृतियाँ कभी नही मारती।
                                                                 
                            
कभी-कभी जगाती कभी उत्तेजित करती।।

ख्याल रखते रखते सिहरन से सिहर जाती।
प्रगतिशील होकर भी खुद को प्रेषित करती।।

बिना स्पर्श के त्वचा पर रोंगटे खड़े हो जाते।
तेरी अनुपस्थिति में स्मृतियाँ कमाल करती।।

जब नींद मेरी पलको से रूठती कभी-कभी।
तकिये पर सिर की कल्पना भयभीत करती।।

चादर में तेरी देह की बची हुई गर्मी 'उपदेश'।
न चाहते हुए तांडव करने पर मजबूर करती।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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एक घंटा पहले

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