सूने से मन्दिर में अनुष्ठान की धूनी।
अवसाद की राख है चन्दन सी धनी।।
आँखों के चारो ओर ज़ज्बात जमे।
आशा की किरण छनकर हुई बौनी।।
तुम मेरे जीवन के अद्भुत अलंकार।
तुमसे खिल उठता तुम्हीं से मैं बनी।।
तेरे अस्तित्व की लौ तड़पती कब से।
दुखों के महाभारत में विवाद से सनी।।
घिर गई बंदिशों के साये में 'उपदेश'।
जमीन से आसमान तक तन्हा जनी।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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