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क्या मोहब्बत नही

                
                                                         
                            अपने थे सो लिहाज़ किया अपने लबों को सिल बैठे।
                                                                 
                            
सीना ज़ख़्मी हुआ ख़ामोशी ओढ़े हम कमरे में बैठे।।

क्या कहते क्या शिकवा क्या शिकायत करते किससे।
औरत होने के नाते गलत थे सो सारे हक़ ही खो बैठे।।

बे-नज़ीर न बन सके शायद यहीं मसला खा गया हमें।
वक़्त भी ज़ालिम बना कई अश्क़ आँखों में छुपे बैठे।।

मैं सबर ही करती रही उसकी फ़क़त एक निगाह क़ो।
उसने न जाने कितने इल्जाम मेरे वजूद पर लगा बैठे।।

फकत दर्द लिखते 'उपदेश' क्या मोहब्बत नहीं उन्हें।
किसी को क्या कहें ये दर्द ही अहसास कब डुबो बैठे।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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5 घंटे पहले

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