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बचपन की यादो में खनक ढूँढती

                
                                                         
                            जो जीने की खुद में ललक ढूँढती है।
                                                                 
                            
घर से निकलती नही फलक ढूँढती है।।

जिनकी नजर में क़ाबिल बहुत हम।
बचपन की यादो में खनक ढूँढती है।।

यों तो मन्त्रमुग्ध है चाहत के पालने में।
नशे की गोलियों में मेरी झलक ढूँढती है।।

सच कहूँ आसमान में सितारे बहुत है।
जाने किन आँखों में चमक ढूँढती है।।

ज़माने से अलग नही 'उपदेश' का राज।
मेरी गली में घूम कर दमक ढूँढती है।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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40 मिनट पहले

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