वो जो रहबर है, बड़ी हस्ती है,
हम मुफलिसो की जान सस्ती है
जहां से गुज़रता है निकासी नाला,
वही एक गरीबों की बस्ती है
अंधेरे में डूबी है कितनी गलियां,
ये ज़मीं रोशनी को तरसती है
सरहदों पर बढ़ा दी है पहरेदारियां,
खुदमुख्तारी परिंदों की हस्ती है
- देवर्षी मनीष येंडे
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