अपनी दिन भर की थकान से
वह जरा-सा
निवृत्त ही तो होना चाहती है
ढूँढती है एक कोना
सुकून का
जहाँ उसने अपनी मन-मुक्त हँसी को
दिनचर्या की खूँटी से
बांध रक्खा है
देखना चाहती है वो उन बागीचों में भी
कि क्या मौसम वहाँ का खिल उठा है?
जहाँ उसने बोये थे
कुछ बीज सुकून के
क्या उन पौधों पर फुर्सतों की
कलियाँ महक उठी होगी ?
वह बचपन की सखियों की
आँखें भी तो देखना चाहती हैं
क्या वो भी उसकी तरह थक कर चूर,
बोझिल-सी हो गयी होगी?
या सुकून ढूँढ रही होंगी या फिर
अधूरी इच्छाओं की टीस कोई ?
वह मायके के आँगन में टटोलना चाहती है
अपने यौवन के स्वप्न-सलोने
जिस पर उसने टाँगे थे
झूमर प्रेम के
क्या वे अब भी वैसे ही
दिलकश रोमानी होंगे?
वह निढ़ाल गिर कर देखना चाहती है
आँगन की चारपाई पर
रात का वह उन्मुक्त सितारों भरा अंबर
और एक चाँद चौदहवीं का
और प्रेम की हलकी मुलायम पदचाप
वह भीगना चाहती है फिर एक बार
स्मृतियों की बारिश में
ताकि दिनभर की थकान से
उसे मिल जाए निवृत्ति
थोड़ी देर के लिए ही सही
वह देह की थकान से अधिक
मन की थकान से व्याकुल है
वह निवृत्त होना चाहती है
क्या उसका इतना भी अधिकार नहीं?
-सुषमा गजापुरे
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