ब्याही हुई बेटी का निर्वाह यदि ,
मायका आजीवन कर पाता।
तो जनकनंदिनी वन न जातीं,
नाता मिथिला से जुड़ जाता।
वाल्मीकि की कुटिया फिर तो,
अश्रु की साक्षी ना बनती।
जनक के सूने आँगन की,
चौखट फिर से हँस उठती।
जब त्रेता का राजा भी,
बेटी का दुःख न बाँट सका
तो कलियुग के इस वर को,
डर ससुराल का कहाँ लगा?
जिस दिन बेटी बोझ नहीं,
अपना अधिकार कहाएगी।
सच मानो हर मिथिला तब,
खुशियों का घर हो जाएगी।
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