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हिंदी साहित्य और सोशल मीडिया

                
                                                         
                            साहित्यिक सब हो रहे,
                                                                 
                            
चबली चोर चकार।
व्हाट्स एप पर इतरा रहे,
कर सोलह श्रृंगार।

सोशल पटलों में बड़ा,
मचा हुआ कोहराम ।
रचनाएं बिखरी पड़ीं,
इधर की उधर तमाम।

साहित्यिक ग्रुप सज रहे,
जैसे नई दुकान।
कुछ मीठा सा बेचते,
कुछ फीके पकवान ।

हर कोई फेंक रहा है ,
अपना साहित्यिक ज्ञान।
छंद छबीले रच रहे,
कुछ बेछन्द विधान।

हिंगलिश में रचना करें,
हिंदी होती दूर।
शब्दजाल में फंस पड़ी,
कविता है बेनूर।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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