एक रॉन्ग नंबर से शुरू हुआ था,
बातों का वह प्यारा सिलसिला,
न कोई पहचान थी पहले,
न मिलने का कोई था फैसला।
नाम था उसका नीरज प्यारा,
खंदौली, आगरा उसका ठिकाना,
मैं बी.एड. कर रहा था उन दिनों,
छटीकरा, मथुरा था आशियाना।
धीरे-धीरे बातें बढ़ती गईं,
दिल की धड़कनें जुड़ती गईं,
अनजाने में जो रिश्ता बना था,
उसमें प्रेम की कलियाँ खिलती गईं।
मुलाकातें बस दो ही हुईं,
पर यादें कितनी गहरी थीं,
एक बार चुपके से उसके घर पहुँचा,
आँखों में कुछ उम्मीदें ठहरी थीं।
उसे खबर तक होने न दी,
कि मैं उसके घर आया था,
उसकी गलियों की मिट्टी में,
अपना एक सपना छोड़ आया था।
वक्त ने फिर करवट बदली,
किस्मत ने दूरी लिख डाली,
नीरज की शादी हुई किसी और से,
और मेरी दुनिया कुछ खाली-खाली।
लेकिन कहानी यहीं न रुकी,
एक मुलाकात फिर हुई आगरा में,
वह शादी के बाद का मिलना था,
कुछ पुराने एहसास थे दिल में।
कुछ पल फिर करीब आए थे,
कुछ भूले अहसास जगाए थे,
जो रिश्ता कभी अधूरा छूटा था,
उसके कुछ पन्ने फिर खुल आए थे।
न जाने वह प्रेम था या यादों का असर,
न जाने दिल क्यों था इतना बेखबर,
कुछ रिश्ते नाम नहीं पाते हैं,
फिर भी उम्रभर याद आते हैं।
आज भी सोचता हूँ कभी-कभी,
वह इत्तेफाक़ कितना हसीन था,
एक अनजान नंबर से मिला था जो,
वह रिश्ता दिल के कितना करीब था।
-सुशील कुमार सिंह
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