यादों की गली में,,,
यादों की गली से रोज़ नहीं,
तो कभी- कभी गुजरा करो।
वादों की तरह,
यादों से भी कभी कभी
यारी निभाया करो।
रूह से रू -ब -रु
इबादत से सुर्खरूं
अदब से बा-अदब
कभी तो पास बैठा करो।
यादों और वादों
के आबशार में,
कभी कभी तो,
शमा से रौशन
हुआ करो।
शायरी की बहार है ये,
या रूमानियत का खुमार,
यादों की मयकशी में
वायदों की नक्काशी में
काशी में या काबा में,
कभी तो साथ रहा करो।
यादों की गली से रोज़ नहीं,
तो कभी कभी गुजरा करो।
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