कामगार स्त्रियां,,,
रोज़ रोज़ आती-जाती ,
कामगार स्त्रियां।
बतियाती, खोंखियाती,
अपनी अपनी बोलियों में,
कामगार स्त्रियां।
डिजिटल युग में
काम आने पर
या के मिलने पर
एक दूसरे से
रास्ते और काम की
जगह की जाँच पड़ताल करती
कामगार स्त्रियां।
सुस्ताती, मस्ताती
खुशी -ग़मी के पलों
को बिताती,
कामगार स्त्रियां।
पार्क, बस -,
या यूं ही राह में
अपने ज़िक्र और
फ़िक्र को साझा
कर अपना बोझ
हटाती- मिटाती,
कुछ साँवरी ,
कुछ पीली सी जर्द
कुछ हँसती, कुछ मुँह
बिसूरती,
घर के चूल्हे में ईंधन,
राशन और सुख डालती,
कामगार स्त्रियां।
घर - बाहर ,
परिवार का ख्याल रख,
गुरबत का शरबत पी
साहचर्य ऑ आश्चर्य
का अमृत सौंपती
यही हमारी कामगार स्त्रियां।
-सूर्यकांत शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X