जीवन का संतुलन
प्रारब्ध ऑ कर्म भाव
के परिणाम से,
जीवन के संतुलन को
बनाने तू आया।
निराकार ब्रह्म स्वरूप
से साकार रूप में तू
आया।
माया के विभिन्न रूप
रंग रस गंध के माधुर्य में
आने से पहले
माँ के गर्भ में
वियोगी सा तू मुस्कुराया।
माँ ने आते ही
तुझे अमृत पान
कराया।
जीवन जिजिवषा
का अहसास पाकर,
तू मासूम सा प्रेममय
हो मुसकाया ।
सुख- दुख,
धूप-छाँह,
सरीखी स्थितियों
में ,
जीवन का संतुलन
बनाने तू आया।
जीवन पर्यंत बाधा
विघ्नों को कर वहन
सहन,
जीवन के संतुलन की
जिजिविषा लिए
अब धरा पर तू आया
पंचविकारों से युक्त
पंच तत्त्व पुतले में
तू आ समाया ।
इस पुतुल में
बुद्धि के सारथी
संग,
दशद्वार के मनोरम
पुर में आत्मा संग
तू हर्षाया।
सुदर्शन सात चक्रों
औ पंच कोष युक्त,
तू जीवन में संतुलन
बनाने,
जैसे पुनः मृत्युंजय
बन धरा पर आया।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा
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