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सफ़ेद झूठ की चादर

                
                                                         
                            ऐसा ,
                                                                 
                            
लगने लगा है कि - -
इस युग में ,
मिलावट से - -
कुछ भी ,
ना बचा है - -
सच कह रहा हूँ ,
बोल -चाल - -
हाव - भाव ,
और - -
रिश्ते - नातेदरी भी ,
इससे भी - -
अछूता नहीं रहा l

सचमुच ,
लग रहा है कि - -
मिलावट का ही,
जमाना आ गया है - -
यदि रिश्ता या ,
संबंध को - -
लम्बा या ,
टिकाऊ रखना - -
चाहते हो तो - -
हाँ में हाँ का,
मिलावट - -
अपने रिश्ते या,
संबंध में - -
करते रहिये,
तो लम्बेँ वक़्त तक - -
चलता रहेगा l

इस लिए ,
अब मैं भी - -
कुछ अलग ,
सीख रहा हूँ - -
आपको को भी,
ताज्जुब (आश्चर्य ) होगा - -
मैं भी एक,
हुनर सीख रहा हूँ - -
मीठा झूठ या,
सफ़ेव झूठ - -
बोलने का हुनर ,
क्योंकि ?
कड़वे सच ने - -
हमसे ,
ना जाने - -
कितने अजिज़ ( अमूल्य ),
चीज हमसे छीन - -
लिया हो,
इसलिए - -
थोड़ा - थोड़ा ,
सफ़ेद झूठ - -
बोलना सीख लिया l
-सुरेश कुमार झा 'अल्हर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 hours ago

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