आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक कचौड़ी दो समोसा आदमी औरत का यही भरोसा।

                
                                                         
                            एक कचौड़ी, दो समोसा,
                                                                 
                            
आदमी-औरत का यही भरोसा।
कचौड़ी बोले—मैं हूँ रानी,
समोसा बोले—मेरी भी कहानी!

कभी दोनों साथ में खाएँ,
कभी एक-दूजे को चिढ़ाएँ।
कचौड़ी बिना समोसा अधूरा,
समोसा बिना कचौड़ी भी अधूरा।

जैसे दोनों मिलकर जीवन सजाएँ,
वैसे ही स्वाद में रंग जमाएँ।
एक में मसाला, एक में जोश,
दोनों मिलें तो मज़ा हो रोज़!

एक कचौड़ी, दो समोसा,
साथ रहे तो क्या है धोखा!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर