फूलों का आंगन बन गया शमशान।
हे ईश्वर! तू बड़ा महान।
दुनिया बनाई यह जहान तूने,
धरती बनाई यह नभ तूने,
पेड़-पौधे बनाए, जानवर तूने।
पर क्यों बनाया ये इंसान तूने।
यह कर दी तूने एक गलती,
जिससे उजड़ गई ये प्यारी सी धरती।
मच गया दुख का माहौल संसार में,
पेड़ों का कटान हो रहा जा हजार में।
हो गए जंगल पेड़ों से हीन।
मनुष्य हो गया भौतिक सुखों में लीन।
कभी चलती थी यहां शुद्ध हवाएं।
आज है सिर्फ दुख और यातनाएं।
प्रदूषित हो रहा वातावरण प्यारा,
जो सबसे पहला घर हमारा।
कभी हमें था इस पर अभिमान।
आज लगता हो जैसे शमशान।
आधुनिकता का यह साया,
बदल डाली धरती की काया।
हो गया है मनुष्य आलसी,
यह व्यक्तित्व उसे लगती शान-सी।
आज ना कहीं कोई भगवान,
सब पूजते रहें शैतान।
कभी यहां पर थी सभ्यता,
विचारों में थी बड़ी भव्यता।
अब वह संस्कृति खो चुकी है,
आधुनिकता अपना बीज बो चुकी है।
अब ज्ञान सब भूल चुके हैं,
झूठ को सत्य मान चुके हैं।
जिंदगी के वास्तविक अर्थ से
कट चुका है इंसान।
मान-मर्यादा भूल गया इंसान,
फूलों का आंगन बन गया शमशान।
हे ईश्वर! तू बड़ा महान।
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