घर की बालकनी में चंद्रोदय
हर रोज़ ही तो होता है
किंतु आज उसे चांद देखने की आतुरता
ज़्यादा है
चांद कुछ अलहदा भी तो है आज
आज का दीर्घ-प्रतीक्षित चांद महज़ चांद नहीं वरन्
एक दृढ़-संकल्पित स्त्री की आस्था,समर्पण,त्याग और संयम की परीक्षा का दिग्दर्शन है,
उस स्त्री के लिए
हर स्त्री की तरह छलनी से चांद और पति को साथ-साथ निहारना,
चांद की जैसी स्थिरता,सौम्यता और शीतलता
को पति में देख लेने की कामना है
चांद तो हमेशा से ही शांत चित्त और सौभाग्य का रुपक ही है
किंतु उस स्त्री के लिए छलनी, पति के सौभाग्य तक पहुंचने के लिए बाधा-कंटक है,
भूख,प्यास से विरत
सौभाग्यकांक्षिणी स्त्री
छलनी का अवरोध पार करके चांद से अपने लिए सौभाग्य खींच लाती है
इसलिए,
छलनी से
चांद और प्रियतम का दर्शन
महज़ करवाचौथ के व्रत की सार्थकता नहीं
व्रतधारी स्त्रीयों के ओसारे में
अध्यात्मिक ऊर्जा और नारी शक्ति की
प्रार्थना प्रभावी होने का पवित्र दृष्टांत भी है
यही नहीं,
चांद ,प्रियतम
और दोनों को छलनी से निहारती
स्त्री,
अपनी-अपनी ऊर्जा परस्पर
न्योछावर करते
घर की बालकनी को ओजमंडल
में परिवर्तित होने का अप्रतिम दृश्य है
-सुनीता भट्ट पैन्यूली
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