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युद्ध के समय

                
                                                         
                            बड़े लोग सोना जुटाने में लगे हैं ।
                                                                 
                            
उन्हें अपना सामाजिक स्तर बढाना है।
उससे निम्न स्तर के लोग पेट्रोल व डीजल जुटा रहे हैं ।
बचे और भी निम्न स्तर के लोग वे पेट्रोलियम गैस को एकत्रित करने में जुटे हैं ।
उन्हें अपनी रोटी की चिंता है।
अब जो स्तर बचा वो इन सब से बेफिक्र है।
वो चूल्हे पर रोटी सेंक रहा है ।
उसे न युद्ध का पता है
न सोने न पेट्रोल न गैस की चिंता है।
व चूल्हे की पकी रोटी के स्वाद में मगन है।
अक्सर पैदल ही अपनी यात्राएँ पूरी कर लेता है।
ज्यादा दूरी है तो साइकिल बहुत है।
इन सब से दूर एक साहित्कार कुछ चिन्तित है ।
वैश्विक हालातों को लेकर, दूसरी तरफ चूल्हे की पकी रोटी का स्वाद ले मुस्कुरा रहा है।
इस तरह एक नयी रचना का जन्म हो रहा उसके मन में ।
-तुलसी बिष्ट 'तनु'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 महीने पहले

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