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विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित : पितरों को समर्पित

                
                                                         
                            ब्याह कर जब नए घर आई तो आप दोनों खड़े साथ थे,
                                                                 
                            
कभी पराया लगा नहीं सिर पर आप दोनों के हाथ थे।
जरा-जरा से काम पर मेरी रोज़ तारीफें होती थीं,
आप दोनों के प्रेम और आशीर्वाद से दूर तकलीफें होती थीं।

पर ज्यादा दिन तक ये सब खुशियाँ टिकी न मेरे पास,
छिन गई मेरी मासूमियत मुझसे दूर हो गई सास।
सासू माँ के जाते ही सूना हो गया घर-अँगना,
ससुर जी भी भूल गए थे जैसे जीना-हँसना।

विधि की कठिन कुल्हाड़ी ने उनका भी छीना साथ,
इतनी बुरी परिस्थिति आई छूटा दोनों का सिर से हाथ।
इसी उम्र में छोड़ गए क्या हम सब से ऐसी भूल हुई,
छूटा बचपन गुम हुआ अपनापन नादानियाँ भी चकनाचूर हुई।

आप दोनों के जाने से सूना आँगन-दरवाजा है,
न कोई बहू अब कहता है न पतोहू कहकर बुलाता है।
जो कुछ था सब आपका था अब आओगे बनकर मेहमान,
भूल-चूक सब क्षमा करके कृपा करना हे पितृ भगवान।

आपकी कृपा से हे पितृ देवता सुखी रहे ये घर-परिवार,
बल, बुद्धि, विद्या देना सबको आरोग्य रहे दुनिया संसार।
आपका उपकार हे सासू-ससुर जी रहेगा हरदम याद हमें,
जाते-जाते हे मेरे दाता देना यही आशीर्वाद हमे।

 
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46 मिनट पहले

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