हां मैं प्राइवेट ही सही पर शिक्षिका कहलाती हूँ,
सरकारी से दस गुना कम वेतन पाकर, उससे 10 गुना ज्यादा जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाती हूँ।
सुबह-सुबह बच्चों से पहले विद्यालय पहुँचती हूँ,
प्रार्थना सभा से लेकर डायरी बेल तक, सब मैं ही सँभालती हूँ।
बोर्ड पर सिर्फ अक्षर या शब्द नहीं, भावनाएं और भविष्य लिखती हूँ,
और शाम को घर की जिम्मेदारियों के साथ - साथ स्कूल की कॉपियां भी जाँचती हूँ।
वेतन के नाम पर बस एक अति प्रतीक्षित अहसास मिलता है,
कुछ ही हजारों में, मेरे पूरे घर का हिसाब चलता है।
न कोई PF, न कोई बोनस , न सम्मान-पत्र,
फिर भी हर रिजल्ट पर मेरा ही नाम चलता है।
छुट्टी माँगू तो सुनना पड़ता है,
"प्राइवेट हैं ", सरकारी नहीं जो रोज छुट्टियां मनाती हैं ?"
बीमार पड़ूँ तो भी जाना पड़ता है,
क्योंकि मेरी गैरहाजिरी में स्कूल की घंटियां रुक जाती है।
फिर भी मैं पढ़ाती हूँ, मन से पढ़ाती हूँ,
क्योंकि इन नन्हीं आँखों में मैं ही सपने सजाती हूँ।
मैं प्राइवेट हूँ, पर मेरी शिक्षा प्राइवेट नहीं है,
मेरा ज्ञान, मेरा संस्कार, मेरी डिग्री बिल्कुल सरकारी, सच्ची और सही है।
एक दिन मेरी भी कलम चीखकर बोलेगी,
मेरी वेदना अखबार में नहीं, सरकार के कानों में गूँजेगी।
कि प्राइवेट शिक्षक भी शिक्षक होता है,
राष्ट्र निर्माता हूँ, मेरा भी बराबर का हक होता है।
सुधा पाण्डेय,अंबेडकर नगर ( शिक्षिका, निजी विद्यालय मनकापुर गोंडा )
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