आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

*अपना हमराही बना लोगे क्या?*

                
                                                         
                            हा मैं बाँट लूँगी दुख तुम्हारे,
                                                                 
                            
तुम मेरे साथ अपना कुछ वक्त बाँट लोगे क्या?

मैं धुल लूँगी बर्तन, कपड़े कर लूँगी पोंछा,
तुम मेरे माथे का पसीना पोंछ दोगे क्या?

मैं बना दूँगी तुम्हारे लिए लज़ीज़ व्यंजन अपनी क्षमता भर,
तुम बिना कमी निकाले उसे प्रेम से खा लोगे क्या?

मैं तुम्हारे हिस्से का भी कुछ धन कमा लूँगी,
तुम मेरे लिए अपना मन कमा लोगे क्या?

मैं आजीवन चलूँगी तुम्हारे कदम से कदम मिलाकर,
तुम मेरे साथ चार कदम आगे बढ़ा लोगे क्या?

मैं पाल लूँगी तुम्हारे वंश को अपने गर्भ में,
तुम सिर्फ मेरे हो ये भ्रम पाल लोगे क्या?

मैं निभा लूँगी तुमसे जुड़े हर रिश्ते सातों जन्म,
तुम भी मुझे ही हर जन्म अपना हमराही बना लोगे क्या?

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर