स्वरूप वास्तविक
कभी -कभी वैसा नहीँ होता
जैसा की दिखता हैं
चकाचौंध रोशनी में देखो
पुराना माल भी बिकता हैं
खरीदते लोग ऊँचे -ऊँचे दामों पर
क्या फर्क पड़ता हैं
अपनी -अपनी पसंद यह तो
आखिर हर कोई सोच रखता हैं
शहर के बाजार में
यहाँ सब बिकता हैं
धूल- माटी हो सही
नाम देकर जिसे
दुकानदार कुछ और कहता हैं
कुछ लगता नहीँ बाकी सा
इंसान तक बिकता हैं
सच कहूँ तो इंसान ही
इंसान को लुटता हैं
कैसे कहूं बात ईमान की
स्पष्ट सब दिखता हैं
कहा किसी ने
शहर हैं साहेब
यहाँ सब बिकता हैं ॥
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