आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

यहाँ सब बिकता हैं .....

                
                                                         
                            स्वरूप वास्तविक
                                                                 
                            
कभी -कभी वैसा नहीँ होता
जैसा की दिखता हैं
चकाचौंध रोशनी में देखो
पुराना माल भी बिकता हैं
खरीदते लोग ऊँचे -ऊँचे दामों पर
क्या फर्क पड़ता हैं
अपनी -अपनी पसंद यह तो
आखिर हर कोई सोच रखता हैं
शहर के बाजार में
यहाँ सब बिकता हैं
धूल- माटी हो सही
नाम देकर जिसे
दुकानदार कुछ और कहता हैं
कुछ लगता नहीँ बाकी सा
इंसान तक बिकता हैं
सच कहूँ तो इंसान ही
इंसान को लुटता हैं
कैसे कहूं बात ईमान की
स्पष्ट सब दिखता हैं
कहा किसी ने
शहर हैं साहेब
यहाँ सब बिकता हैं ॥

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर