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तरुओं के फुनगी से ........

TARUWO KE FUNGI SE
                
                                                         
                            कभी मन कहता हैं
                                                                 
                            
पूछ लूँ !
तरुओं के फुनगी से ,
कौन तुम्हे वृहत हैं करता
एक नन्ही कुनगी से ,
कौन तुममे रस भरता हैं
रंग तुममे कौन भरता हैं
कौन हैं वो ,देख जिसे
मन तुम्हरा मुस्कान भरता हैं
सुबह -साँझ चौपाल जहाँ
पंछी कलरव का लगता हैं
हाँ ! कभी चाहता पूछ लूँ
मेरा यह मन कहता हैं
मेरा यह मन कहता हैं ॥

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8 वर्ष पहले

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