कभी मन कहता हैं
पूछ लूँ !
तरुओं के फुनगी से ,
कौन तुम्हे वृहत हैं करता
एक नन्ही कुनगी से ,
कौन तुममे रस भरता हैं
रंग तुममे कौन भरता हैं
कौन हैं वो ,देख जिसे
मन तुम्हरा मुस्कान भरता हैं
सुबह -साँझ चौपाल जहाँ
पंछी कलरव का लगता हैं
हाँ ! कभी चाहता पूछ लूँ
मेरा यह मन कहता हैं
मेरा यह मन कहता हैं ॥
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