क्या कहूँ ,
सूखे पत्तों से
जो पतझड़ में
टूटकर
फिर रहे
मारे- मारे से
मानो अपना
घर भटक कर !
हाँ ! कभी हवा झोंके से
लिपट जाते हैं
पाँव पकड़कर !
कैसे समझाऊं भला
कैसे उन्हे ?
क्या शोक मनाऊ
मैं उनपर ?
या हर्षित हो जाऊँ
नये किसलय पर,
टहनियों से जो आँखे खोल
देख रहे हैं उभर कर !
पर सम्वेदनाएँ जुड़ी हैं
सूखे पत्तों से ,
आशायें नये किसलय से
हाँ ! यही जीवन है
यही नियति हैं
लिये स्वरूप
यही प्रकृति हैं ॥
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