वह तो आँधी- तूफानों में भी
भला कहाँ डरता है
लालयित छूने को धरा
हरदिन मानो तरसता हैं
भोर में ही जाग किरणों संग
चल पड़ता हैं
सूरज देखो कहाँ थकता हैं
फिर क्यों थक जाऊँ मैं
पथ से अपने ,
भटक जाऊँ मैं ?
देख काले बादलों को
बिजलियों के तड़क से
फिर क्यों डर जाऊँ मैं
क्यों न सूर्य सा प्रकाशित
बन जाऊँ ?
अनंत किरणों के तेज सा
अपनी रोशनी फैलाऊ
सूर्य तो नही बन सकता
पर सूर्य का प्रतिनिधत्व बन जाऊँ मैं ॥
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