सोचता हूँ
कोई अन्यंत्र
ग्रह होता तो ?
कैसे पहचान कर पाता
पृथ्वी को !
हरदिन घटित होते नए- नए
प्रकृति के नियम ,
रूप -रंगो को
कैसे मिलन होता मेरा और तुम्हारा
अगर किसी अन्यंत्र ग्रह पर
जन्म होता मेरा
तब कितना अंतर होता
कभी न मिल पाने का
पर अफ़सोस है ,
दूसरे ग्रहों पर आज भी ,
न पहुंच पाने का ,
वहां भी कोई है या नहीं ?
या सब सुना -सुना जैसे की
धरती की बीरान बंजर भूमि !
क्या पता ?
बिना हवा ,पानी के भी लोग
होते हो वहां जिन्दा !
जहां हवा -पानी आने पर
मचती हो तबाही ,
क्या पता उस सूनेपन में
रहते हो लोग उस ग्रह पर II
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