टहक -टहक देखा
निकला था
चाँद उसदिन
निहारता रहा आँगन से
लौटा था गाँव उसदिन
बरसों बाद शहर से जब
मानो लौटकर कुछ पाया हूँ
सच कहूं तो उस रात उगे
चाँद को चुरा लाया हूँ
देख जिसे याद हो आया
बचपन फिर से लौट आया
जब पकड़ माँ लेपन करती थी
बुकवा खूब रगडती थी
बहला कर बातो में
कहानी सुनाया करती थी
तब चाँद आँगन में मन को
नभ से बहलाता था
देख जिसके सपनों की दुनियाँ
मन बचपन सो जाता था
हर वैभव से परे कुछ
वह अनमोल रतन पाया हूँ
मैं चाँद चुरा लाया हूँ ॥
-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X