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बांस के झुरमुटों से ............

BAANS KE JHURMUTO SE........
                
                                                         
                            
बरसों बाद आज भी ,
वह छाँव याद आता है ,
अमराईओं का मेरा वह ,
गांव याद आता है .

हां ! पीपल की छतनार टहनियां ,
पोखर की नन्ही मछलियां ,
बांस के झुरमुटों का ,
वह सैलाब नज़र आता है ,
हां ! अमराईओं का मेरा वह ,
गांव याद आता है .

याद आते हैं पेड़ इमली के ,
बेल ,महुआ ,बेर के ,
सुनाई सी देती ध्वनि ,
कोटर से पंछी टेर के ,
हां ! याद आते हैं छुटपन के ,
दिन वह गुलेल के ,
भूल कर भी कहाँ भुला ,
मन जिसे भुलाता है ,
हां ! अमराईओं का मेरा वह ,
गांव याद आता है .

हां ! वह खेत नज़र आता है ,
खलिहान नज़र आता है ,
उठता रज - कड़ों से ,
वह बवंडर नज़र आता है ,
सोच जिसे आज भी ,
यह मन घबराता है ,
क्योंकि कहती थी माँ ,
यह भूत होते हैं ,
अरे ! कैसा था वह डर छुटपन का ,
जो आज भी मुझे डराता है ,
अमराईओं का मेरा वह ,
गांव याद आता है

हां ! दिन दुपहरी, साँझ की बेला ,
संग -संग लिए बचपन का रेला ,
मेरे नन्हे पांवो ने ,
धूल में नंगा सदा है खेला ,
हां ! धूल पर बने नन्हे पांवो का ,
पद -चिन्ह याद आता है ,
हां ! अमराईओं का मेरा वह ,
गांव याद आता है ,
गांव याद आता है II

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8 वर्ष पहले

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