बरसों बाद आज भी ,
वह छाँव याद आता है ,
अमराईओं का मेरा वह ,
गांव याद आता है .
हां ! पीपल की छतनार टहनियां ,
पोखर की नन्ही मछलियां ,
बांस के झुरमुटों का ,
वह सैलाब नज़र आता है ,
हां ! अमराईओं का मेरा वह ,
गांव याद आता है .
याद आते हैं पेड़ इमली के ,
बेल ,महुआ ,बेर के ,
सुनाई सी देती ध्वनि ,
कोटर से पंछी टेर के ,
हां ! याद आते हैं छुटपन के ,
दिन वह गुलेल के ,
भूल कर भी कहाँ भुला ,
मन जिसे भुलाता है ,
हां ! अमराईओं का मेरा वह ,
गांव याद आता है .
हां ! वह खेत नज़र आता है ,
खलिहान नज़र आता है ,
उठता रज - कड़ों से ,
वह बवंडर नज़र आता है ,
सोच जिसे आज भी ,
यह मन घबराता है ,
क्योंकि कहती थी माँ ,
यह भूत होते हैं ,
अरे ! कैसा था वह डर छुटपन का ,
जो आज भी मुझे डराता है ,
अमराईओं का मेरा वह ,
गांव याद आता है
हां ! दिन दुपहरी, साँझ की बेला ,
संग -संग लिए बचपन का रेला ,
मेरे नन्हे पांवो ने ,
धूल में नंगा सदा है खेला ,
हां ! धूल पर बने नन्हे पांवो का ,
पद -चिन्ह याद आता है ,
हां ! अमराईओं का मेरा वह ,
गांव याद आता है ,
गांव याद आता है II
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X