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पहाड़ का दर्द...

pahad kaa dard
                
                                                         
                            कल मैं निवास था नदियों का झरनों का
                                                                 
                            
पेड़ों ,जीवों तथा पौधों के कई वर्णों का
भूगर्भ –जलस्तर का मै ही पैमाना था
हवा को वायु बन जाने का बहाना था
ताप परिवर्तन कर वायु को दिशा देता था
बदले मे इसके मैं कुछ भी नहीं लेता था

मनुष्य को भाया नही मै पसंद आया नही
स्वयं को खुश देखना मनुष्य सह पाया नही
वह अशांत ,मुझे देख शांत ,उकसाने को आया
निर्दयता को निर्माण कह उसने मुझको पाठ पढाया
ले बारूद छेदक आयुध मुझे टुकडों मे फैलाया
अपना यह विखंडित रूप देख्कर मै घबराया

पहाड़ से पथर बना, बना पथर से रोड़ा हूं
निज निष्ठुरता मे नया आयाम जोडा हूं
हूं चकित, हुआ मैं पतित , निर्ममता बढ जाने से
ले लिया मनुज -चरित सम्पर्क मे आने से
पेड पौधों के जगह अब ईमारतें उगाता हूं
वन्य जीवों के साथ साथ पशु पक्षी भगाता हूं
मुनीयों के आश्रम की जगह ,सिमेटे हूं मैखाना
मेरे बदले रूप से पर्यावरण मिटता रोजाना
गगंचुम्बी ईमारतें बन मिट्टी रोज घटाता हूं
सड़क बन वाहनों द्वारा प्रदुषण फैलाता हूं

था संवेदनहीन पर प्रकृति को गोद मे पालता था
निष्ठुर कहा जाता था, ये गम मुझे सालता था
हे मनुष्य तेरी निर्दयता से मैं पहाड भी हार गया
हे निष्ठुरता के नये स्वामी ,निर्ममता के हो रूप नया
-----बिजय बहादुर तिवारी

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
9 वर्ष पहले

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