आज सुबह अख़बार खरीदा
पूरा इक संसार खरीदा
देशो- दुनिया की खबरों का
आर खरीदा पार खरीदा
हिंद वतन पर पाक देश का
इक छोटा सा वार खरीदा
चीन देश को देखा मैंने
औरों से हथियार खरीदा
और सियासत बच ना पाई
नेता का घर बार खरीदा
इस सत्ता के अब क्या कहने
चुन-चुनकर लाचार खरीदा
दर्द खरीदी ज़ख्म खरीदा
विफल किसी का प्यार खरीदा
माँ की ममता जाते देखी
और पिता बदकार खरीदा
बाबाओं के झाँसे में आ
अंधभक्त लाचार खरीदा
मूल्य हनन होते समाज के
मानवता की हार खरीदा
महज़ नारियों से सुसज्जित
विज्ञापन बेकार खरीदा
संपादकी बड़ा मन भाया
अभिव्यक्ति अधिकार खरीदा
खेलकूद दुनिया की मैंने
जीत खरीदी हार खरीदा
घटती बढ़ती चलती रहती
सेंसेक्स बाजार खरीदा
कुछ विशेष पृष्ठों को देखा
तब सोचा इतवार खरीदा
ब्यूटी आए या ना आए
टिप्स जरूरी यार खरीदा
सत्य बोध साहित्य जगत में
गीतों की झंकार खरीदा
ज्ञान कराती लघुकथाएँ
और अहम सुविचार खरीदा
गिरती पड़ती मानवता का
तब मैंने उपचार खरीदा
जब कुरान की आयत देखी
जब गीता का सार खरीदा
© सृष्टि सिंह
शोधार्थी, हिंदी विभाग
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X