जब आना मुझे बता देना,
मुझे पता नहीं चल पाता है,
निष्प्राण हूँ मैं तेरे आने से,
मैं जीवित हो जाता हूँ।
जग गया अगर एक बार यहाँ,
फिर जग में सब कर पाता हूँ,
तेरे ही सहारे चल-फिर सकता,
गिरता हूँ और उठ पाता हूँ।
मेरे अंग बने हों चाहे जैसे,
पर तू ही इन्हें चलाता है,
जल, फल, अन्न आदि सब कुछ,
प्रकृति से ही मिल पाता है।
बेशक मैं शरीर हूँ लेकिन,
तेरे बिन अस्तित्व नहीं मेरा,
कितना भी स्वस्थ, कितना बलिष्ठ,
पर जीवन न जी पाता हूँ।
तेरे आने से आँखें खुलतीं,
मन में चेतनता आती है,
तेरे जाते ही यह दुनिया,
सूनी-सूनी हो जाती है।
तू ही श्रम में शक्ति बनकर,
मुझको आगे बढ़ाता है,
थके हुए इस तन-मन को भी,
नई ऊर्जा दे जाता है।
न दिखता है, न पकड़ा जाता,
फिर भी सबसे पास है तू,
हर धड़कन में, हर साँसों में,
जीवन का विश्वास है तू।
जब तक साँसों का संग तेरा,
तब तक जीवन चलता है,
तेरा साथ छूटते ही फिर,
यह शरीर मिट्टी बनता है।
इसलिए हे जीवनदाता,
तेरा ऋण कैसे चुका पाऊँ?
जब तक साँसें साथ निभाएँ,
जीवन सार्थक कर जाऊँ।
-सूबा लाल "अंजाना"
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