आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सीखने का अंत नहीं

                
                                                         
                            अबोध मन से सीख रहे हैं,
                                                                 
                            
जीवन-पथ पर बढ़ते हैं,
कुछ आँखों से देख-देखकर,
कुछ जन के आचरण से।

कुछ माता-पिता से सीखा,
कुछ गुरुजनों और मित्रों से,
कुछ रिश्तों की मधुर सीखें,
कुछ अपने अनुभवों से।

कुछ प्रकृति के रंगों से,
कुछ सूरज-चाँद-सितारों से,
कुछ नदियों और झरनों से,
कुछ धरती के पहाड़ों से।

ठोकर भी कुछ सिखलाती है,
हार नई राह दिखलाती है,
गलती से जो सीख ले मानव,
जीवन-राह सँवर जाती है।

ज्ञान का कोई अंत नहीं,
सीखने की कोई उम्र नहीं,
जो हर दिन कुछ सीखता जाए,
उससे बढ़कर समृद्ध नहीं।
-सूबा लाल "अंजना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर