पत्ते वृक्षों का साथ छोड़ते ही नीचे आ जाते हैं,
बेकद्री के संग इधर-उधर कुछ दिन तक धक्के खाते हैं।
अस्तित्वहीन होकर आखिर, एक दिन मिट्टी में मिल जाते हैं,
कभी शाखों की शान रहे जो, वक्त के हाथों खो जाते हैं।
जब तक वृक्षों से जुड़े रहे, तब तक मान-सम्मान मिला,
धूप सहकर, आँधी झेलकर, जीवन का हर मुकाम मिला।
हरियाली बनकर जग को अपनी सुंदर छाया देते थे,
पंछी भी आकर डालों पर, अपने अपने सपने बुनते थे।
टूट गए जब डाली से तो, कोई पूछने वाला नहीं,
कल तक जो थे सबके अपने, आज उनका कोई नहीं।
हवा के झोंके जहाँ ले जाएँ, वहीं पड़े रह जाते हैं,
कभी पैरों से कुचले जाते, कभी आग में जल जाते हैं।
यही कहानी मानव जीवन की, यही समय का फेर है,
सुख में अपने साथ खड़े हैं, दुःख में कोई न शेर है?
जब तक पद, धन और शक्ति है, दुनिया मान बढ़ाती है,
वक्त बदलते ही अक्सर, पहचान भी खो जाती है।
इसलिए किसी को तुच्छ समझकर कभी उसे दुत्कारना नहीं,
समय बड़ा बलवान है, इस बात को कभी बिसारना नहीं।
आज जो ऊँचा बैठा है, कल नीचे भी आ सकता है,
सूखा पत्ता भी मिट्टी बनकर, नया वृक्ष उगा सकता है।
पत्तों से यह सीख लो, जीवन में अभिमान न करना,
साथ निभाना सीखो सदा, केवल स्वार्थ का मान न करना।
धन-दौलत और पद का गौरव, यहीं धरा पर रह जाना है,
प्रेम, दया और नेक कर्मों से ही, जीवन सफल बनाना है।
-सूबा लाल ‘अंजाना’
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