जी करता है जिऊँ अगर तो,
परहित में ही जिऊँ,
सेवा-भाव की अमर पंक्ति संग,
जीवन की कविता लिखूँ।
काम किसी के आ पाऊँ,
ऐसा जीवन मैं जिऊँ,
जीते-जी कुछ कर्म करूँ ऐसे,
मरकर भी अमर रहूँ।
मेरी चाहत है अपना जिगर,
किसी के जिगर से जोड़ सकूँ,
दुख में डूबे किसी मनुज को,
हँसने की राह पे मोड़ सकूँ।
असहाय कोई जीवन में हो,
तो सहारा उसका बन पाउँ,
गिरते को सदा उठाऊँ मैं
दुख में उसके संग चल पाउँ।
भूखा कोई मिल जाए मुझको,
उसकी भूख भी मिटा पाउँ,
प्यासे अधरों पर मुस्कान बिखेर,
जीवन में रस भर पाउँ।
जिसके मन में दर्द छिपा हो,
उसका दर्द समझ पाऊँ,
प्रेम भरे दो बोल बोलकर,
उसके दिल को छू पाऊँ।
प्रेम की निर्मल अमृत-धारा,
हर दिल में मैं बहा पाऊँ,
जाति-धर्म का भेद भुलाकर,
सबको मै अपना पाऊँ।
मन निर्मल हो, भाव पवित्र हों,
अहंकार से दूर रहूँ,
अपने सुख का कुछ अंश बाँटकर,
दुखियों के संग खड़ा रहूँ।
धन-दौलत की चाह नहीं है,
नाम-यश की आस नहीं,
इतना ही बस वरदान मिले—
जीवन व्यर्थ न जाए कहीं।
जब अंतिम साँसें चलने लगें,
मन में कोई मलाल न हो,
पीछे मुड़कर देखूँ तो बस,
किसी का जीवन बेहाल न हो।
जितना पाया, उतना बाँटूँ,
जितना सीखा, ज्ञान दूँ,
जिस राह मिला कोई भटका,
उसको आगे बढ़ने का मान दूँ।
यदि मेरे कर्मों से कोई,
एक भी जीवन मुस्का पाए,
तो समझूँ मैं धन्य हुआ ,
जीवन मेरा सफल कहाए।
मिट्टी का यह तन मिट जाएगा,
साँसें एक दिन थम जाएँगी,
लेकिन मेरे अच्छे कर्मों की,
यादें फिर भी रह जाएँगी।
बस इतनी-सी चाह है मेरी,
जीवन किसी के काम आए,
जाते-जाते इस दुनिया को,
मेरा ये प्रेम भी याद आए।
परहित में जीवन अर्पित हो,
सेवा मेरी पहचान बने,
मेरे होने से किसी दुखी के,
जीवन में कुछ आस जगे।
-सूबा लाल "अंजाना"
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