कौन सहारा देगा जिनके पास नहीं कुछ भी है,
रोटी को जो तरस रहे, जीना भी मुश्किल है।
दिल में कितनी इच्छाएँ हैं, आँखों में सपने हैं,
भूख से बड़ी कोई चिंता नहीं, सपने सब अपने हैं।
शिक्षा की बातें होती हैं, पर पेट कहाँ समझता है,
दिनभर घर और राह नापता, मन भीतर से डरता है।
शरीर में ऊर्जा ही न हो तो दिमाग कैसे काम करे,
एक कदम बढ़ाने से पहले, दूसरा कदम कैसे धरे?
गाँव में कोई काम न मिलता, शहर भी जा नहीं पाता,
कहाँ रहेगा, क्या खाएगा, जब तक काम नहीं पाता?
जिसका आज ही संकट में है, कल से क्या नाता,
भूखा इंसान भविष्य की बातें कैसे समझ पाता?
न घर है, न आमदनी, न कोई अपना सहारा,
उसके जीवन में छाया है बस एक अंधियारा।
कहते हो पढ़ो, बढ़ो, विकास की राह पकड़ो,
पहले उसके हाथ में रोटी दो, फिर सपनों को पंख दो।
भूखे पेट शिक्षा भी अधूरी, विकास भी बेकार,
पहले जीवन बचाना होगा, फिर भविष्य सँवार।
जिसके पास आज नहीं है, उसे कल का विश्वास दो,
रोटी, घर और काम देकर, जीने का अधिकार दो।
-सूबा लाल "अंजाना"
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