चले जा रहे थे जीवन की राह पे,
मगर आ गए कितने काँटों के जंगल।
आए थे चौराहे कई-कई जगहों पे,
मगर सच्ची राह न आई नज़र कहीं पे।
मिली गर होती सही राह की निशानी,
तो आसान हो जाती जीवन की कहानी।
हर मोड़ पर खड़े थे सवालों के पहरे,
किस ओर चलें, जब धुँधले थे सवेरे।
कभी अपनों ने रोका, कभी गैरों ने टोका,
कभी भाग्य ने रूठकर उम्मीदों को रोका।
कभी ठोकरों ने राह का पता बतलाया,
कभी गिरते हुए हौसले ने उठना सिखाया।
भटकते हुए भी कदम रुकने नहीं दिए,
आँखों के सपनों को झुकने नहीं दिए।
माना कि मंजिल का पता मिलता नहीं था,
पर मन में विश्वास का दीप बुझता नहीं था।
'अंजाना ' समझ आया, यही जीवन की कहानी,
हर मोड़ पर मिलती है एक नई निशानी।
जो ठोकरों से सीखकर आगे बढ़ जाता है,
वही काँटों में भी फूल खिलाता है।
राहें कठिन हों तो हिम्मत नहीं हारना,
अँधेरों में उम्मीद का दीपक सँवारना।
सच्ची राह मिलती है अनुभव के सहारे,
जो धैर्य से चलता है, दिन होते हैं उसके प्यारे।
-सूबा लाल ' अंजाना '
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