गाँव के पोखरे, बचपन के दिन,
आज बहुत याद आते हैं,
कूद-कूदकर खूब नहाते,
संग-साथी मुस्काते हैं।
आस-पास के खेत उसी जल से,
सींचे जाते थे,
गर्मी में पशु बड़े प्रेम से,
पानी पीते, नहाते थे।
चारों तरफ ही वृक्ष खड़े थे,
हरियाली से भरपूर थे,
मीठे-मीठे फल खाने को,
सबके लिए मशहूर थे।
गर्मी में उनकी छाया में,
पशु-पक्षी होते थे,
गाँव के ढेरों लोग भी आकर,
वहीं नीचे सोते थे।
पोखर का जल जीवन देता,
धरती की प्यास बुझाता था,
प्यासे पंछी, पशु और राहगीर,
सबको गले लगाता था।
न कोई रोक, न कोई टोक,
सबका उस पर अधिकार था,
गाँव के हर छोटे-बड़े के लिए,
वह पोखर परिवार था।
आज वही पोखर सूख रहे हैं,
कूड़े से भर जाते हैं,
पेड़ कटे, हरियाली घटती,
पंछी भी कम आते हैं।
जिस जल ने पीढ़ी पाल दी,
उसको मत तुम खोने दो,
पोखर, पेड़ और जल-स्रोतों को,
फिर से जीवन होने दो।
गाँव बचेगा, जल भी बचेगा,
बचेगी हरियाली,
पोखर बचेंगे तो बच पाएगी,
धरती की खुशहाली।
-सूबा लाल "अंजाना"
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