आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गाँव के पोखरे

                
                                                         
                            गाँव के पोखरे, बचपन के दिन,
                                                                 
                            
आज बहुत याद आते हैं,
कूद-कूदकर खूब नहाते,
संग-साथी मुस्काते हैं।

आस-पास के खेत उसी जल से,
सींचे जाते थे,
गर्मी में पशु बड़े प्रेम से,
पानी पीते, नहाते थे।

चारों तरफ ही वृक्ष खड़े थे,
हरियाली से भरपूर थे,
मीठे-मीठे फल खाने को,
सबके लिए मशहूर थे।

गर्मी में उनकी छाया में,
पशु-पक्षी होते थे,
गाँव के ढेरों लोग भी आकर,
वहीं नीचे सोते थे।

पोखर का जल जीवन देता,
धरती की प्यास बुझाता था,
प्यासे पंछी, पशु और राहगीर,
सबको गले लगाता था।

न कोई रोक, न कोई टोक,
सबका उस पर अधिकार था,
गाँव के हर छोटे-बड़े के लिए,
वह पोखर परिवार था।

आज वही पोखर सूख रहे हैं,
कूड़े से भर जाते हैं,
पेड़ कटे, हरियाली घटती,
पंछी भी कम आते हैं।

जिस जल ने पीढ़ी पाल दी,
उसको मत तुम खोने दो,
पोखर, पेड़ और जल-स्रोतों को,
फिर से जीवन होने दो।

गाँव बचेगा, जल भी बचेगा,
बचेगी हरियाली,
पोखर बचेंगे तो बच पाएगी,
धरती की खुशहाली।
-सूबा लाल "अंजाना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर