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दीपक से जुगनू, जुगनू से सूरज

                
                                                         
                            कितना भी घोर अंधेरा हो,
                                                                 
                            
दीपक बनकर जलना सीखो।
कितने भी राह में काँटे हो,
उस पर भी कदम बढ़ाना सीखो।

जुगनू बनकरके चमकते रहना,
अपनी चमक को कम मत आँकना,
तेरी नन्ही-सी सूक्ष्म रोशनी भी,
भूले राही को राह दिखा सकती है।

मेहनत की लौ जब प्रखर हो जाए,
सूरज-सा अपना तेज जगा,
अपने जीवन के उजियारे से,
परहित आँगन में भोर सजा।

दीपक से जुगनू, जुगनू से सूरज,
यही विकास की सच्ची पहचान,
खुद जलकर जो राह दिखाए,
वही कहलाए इंसान महान।
-सूबा लाल "अंजाना"
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53 मिनट पहले

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