भोर की शीतलता ने मन में ऐसी शांति ला दी,
स्वर्णिम आभा सूर्य देव की सुबह-सुबह दिखला दी।
मंद-मंद बहती बयार अमृत-रस बरसाती है,
शुद्ध हवा तन-मन को सुख की अनुभूति कराती है।
पंछी मधुर स्वर में जागें, नई उमंग भर जाती है,
फूलों की खुशबू चारों ओर मन को खूब लुभाती है।
हरी घास पर ओस की बूँदें मोती जैसी लगती हैं,
भोर की निर्मल किरणें जीवन में आशा जगाती हैं।
भोर समय उठकर पढ़ना मन में ज्ञान बढ़ाता है,
थोड़ा-सा व्यायाम शरीर में नवबल भर जाता है।
धीरे-धीरे घूमने से तन-मन दोनों खिल जाते हैं,
सुबह-सुबह के ये पल दिनभर साथ निभाते हैं।
मिलते हैं जब राहों में अपने, सुख-दुख बाँट लेते हैं,
हँसी-मजाक की दो बातें मन के बोझ उतार देती हैं।
अपनों की मुस्कान देखकर मन में खुशी समाती है,
छोटी-सी यह मित्रता जीवन को सुंदर बनाती है।
न कोई जल्दी, न चिंता, न मन में कोई भार रहे,
भोर की बेला में हर चेहरा खुशियों का संसार रहे।
शीतल हवा और स्वर्णिम किरणें जब मन को छू जाती हैं,
दिनभर अच्छे भावों की सुंदर लहरें आती हैं।
प्रकृति की यह भोर हमें हर दिन संदेश सुनाती है,
स्वस्थ तन और शांत मन से जीवन राह दिखाती है।
जो भोर सँवार ले अपना, उसका दिन सँवर जाता है,
प्रकृति के संग बिताया पल जीवन सुखमय कर जाता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X