आईने के उस पार
हज़ारों मुखौटे हैं चेहरों पर,
किस-किस को पहचान पाओगे?
इम्तिहान ले अगर वक़्त,
तो किसके पास वक़्त माँग पाओगे?
ज़िंदगी का पहिया बिना रुके
यूँ ही चलता जाता है,
आख़िर किस-किस के लिए
पीछे रुकते जाओगे?
शुक्रगुज़ार हो अगर,
तो उस ख़ुदा का शुक्र मनाना,
जो हर आईना साफ़ दिखा जाता है…
वरना इतने पर्दों को हटाकर
आईना कहाँ देख पाओगे?
धुँधली-सी आँखों पर
मदमस्त नशा चढ़ा है,
कहाँ तुम किसी को ओझल कर पाओगे?
जो सच सामने खड़ा है,
उससे कब तक नज़रें चुराओगे?
आख़िर कितना भागोगे ख़ुद से,
कब तक दुनिया को समझाओगे?
एक दिन आईने के सामने
बस ख़ुद से ही नज़रें मिलाओगे।
— सोनाली रितुराज खंडेलवाल
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