आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मसला एक और दो का यह,जा ना सका सुलझाया अब तक.

                
                                                         
                            जान बूझकर सच,सपनों से ,हमने दिल बहलाया अब तक.
                                                                 
                            
शाम ढलेगी अब जल्दी ही, साथ चलेगा साया कब तक?

ख़ामोशी से दबा दिया था, मन की गहराई में जिसको ,
आँखों से निकला है बह कर,दर्द ना जो कह पाया अब तक.

जिसको दिल ने अपना समझा, उसको दोस्त बनाया हमने,
किसने साथ दिया या धोखा, नहीं हिसाब लगाया अब तक.

चला गया दिन और रात भी दरवाजे तक आ पहुंची है ,
छाने लगा अंधेरा भी अब, नहीं चराग जलाया अब तक.

दरिया से क़तरा मिलता है, या क़तरे में ख़ुद दरिया है ?
मसला एक और दो का यह,जा ना सका सुलझाया अब तक.

मेरे पास मोहब्बत ही है, बदले मे देने को तुझको,
करते आये तिज़ारत हम तो, लेकर यह सरमाया अब तक.

क्या उसके रुख़ पर पर्दा है, उसकी ही अपनी ज़ुल्फ़ों का?
या मेरी अपनी नज़रों ने, उसका रूप छिपाया अब तक?
-सोमेश शर्मा
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
21 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर