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जहाँ जगने का कोई इरादा नहीं था।

                
                                                         
                            हाँ,
                                                                 
                            
मैंने कल्पना की शरण ली,
कुछ देर के लिए।

कुछ देर के लिए...
कहानियों में खो गया,
गीतों में बह गया,
नींदों में उड़ गया,
जहाँ जगने का कोई इरादा नहीं था।

क्या यही पलायन है?
शायद।

पर मैं जानता हूँ,
मुझे लौटना होगा
अपनी अधूरी किताबों के पन्नों में,
अपनी ग़लतियों की गलियों में,
अपनी ही नज़रों से मिलने।

पर तब तक
थोड़ा पलायन और सही...
थोड़ा और बहक जाने दो,
थोड़ा और खो जाने दो,
शायद लौटने की ताक़त
वहीं कहीं मिल जाए।

क्या यही पलायन है?
शायद।
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7 घंटे पहले

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